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“इतिहास के आईने में हम “

युग आते हैं जाते हैं .
युग ऐसे बीत जाते हैं जैसे घड़ी घंटा बीता हो और फिर जो अभी हो रहा है वो सब कुछ बीती हुई कहानी बन कर इतिहास के पन्नों में बन्द हो जाता है . सदियों बाद जब वो पन्ने फिर से खुलते हैं तो पिछले समय के मनुष्यों , उन के चरित्र और उनके द्वारा किये गए कार्य व्यवहार का ब्योरा एक एक कर के उनके वंशजों के सामने आता जाता है . वो वंशज , जो आठ ,दस , पचास, सौ पीढ़ियां बीत जाने के बाद अपने पूर्वजों को शक्ल तो क्या नाम से भी नहीं जानते होंगे , इतिहास के द्वारा जानेंगे .
हम इस समय जिस युग में जी रहे हैं , आज से सौ पीढ़ी बाद हमारे वंशज हमारे इतिहास के बारे में क्या जानेंगे कभी सोचा है ??
नहीं सोचा है तो सोच लीजिये . इंटरनेट पर सब कुछ सुरक्षित है . अब तो इतिहास के साथ छेड़ छाड़ भी नहीं हो सकती . देख लीजिये , हमारे वंशज कहीं हम पर लानत न भेजें .
कहीं हमारा युग झूठों, बेईमानों , ठग – चालबाजों और कुटिलों के युग के नाम से न जाना जाये. इतिहास के पन्नों पर हमारे लिए लिखा होगा…
” ….इक्कीसवीं शताब्दी के आते आते भारत नाम के देश में , मनुष्यों के अन्दर से मनुष्यता मर चुकी थी .लोग सच बोलने वालों को जान से मार डालते थे . सीधे सच्चे इंसान का घर उजाड़ दिया जाता था. नारियाँ घर के बाहर तो क्या घर के अन्दर भी सुरक्षित नहीं थीं.
इस युग में कर्महीन लोगों ने अपने निकम्मेपन को ढकने के लिए भगवान नाम की काल्पनिक शक्ति का सहारा लिया हुआ था और अपने निकम्मे पन को “भगवान की मर्जी ” कह कर सब कुछ उसी के माथे मढ़ दिया करते थे . साथ ही साथ ये लोग सच्चाई का ढोंग बघारने के लिए भी भगवान की पूजा करते थे . यानि कि जो जितना बड़ा ढोंगी होता था वो उतना ही ज़ोर से भगवान का नाम लिया करता था . कोई भी व्यक्ति बिना किसी स्वार्थ के किसी से मिलना पसंद नहीं करता था और न ही स्वार्थसिद्धि किये बिना किसी की सहायता ही करता था . लोग अवसरवादी होते थे और चढ़ते सूरज को प्रणाम करते थे . अधिकांश लोग एक दूसरे को धकेल कर गिराने और खुद उनके सर पर लात मार कर आगे बढ़ने का मौका ढूँढते रहते थे . नेता कुर्सी हथियाने के लिए शराफत का चोला पहनते थे लेकिन अन्दर ही अंदर देश को लूट कर अपना घर भरने के लिए जाल बुना करते थे . वे अपने किये गए कामों की चर्चा न करके जाहिलों गंवारों की तरह विपक्षियों को कोसते और व्यंग्य करते रहते थे .
अधिकतर लोग खुद निकम्मे होते थे लेकिन काम करने वालों को अडंगा लगाने के लिए कुछ भी कर गुजरने को तैयार रहते थे . जो लोग किसी लायक नहीं होते थे वो लायक लोगों से कमीनगी की हद तक जलते थे . कोई भी व्यक्ति , किसी को भी , कैसी भी गंदी से गंदी गालियाँ दे लेता था, लेकिन साधु का स्वांग बना कर दूसरों को सदुपदेश देने में उसे किंचित मात्र भी शर्म नहीं आती थी.

भारत देश के नष्ट हो जाने का सबसे बड़ा कारण वहाँ की एक शर्मनाक परम्परा रही , जिसको वे धर्म और जाति का नाम देते थे . इस बेशर्मी भरी परम्परा के अंतर्गत कुछ मनुष्य अकारण ही खुद को उच्च और अन्य लोगों को नीच घोषित कर देते थे .नीच की श्रेणी में डाले गए मनुष्यों को उच्च वर्णियों से कम सुविधायें प्राप्त होती थीं और समाज में उनका बिलकुल भी मान सम्मान न होता था .
इस असम्मान के विरुद्ध कुछ लोगों ने आवाज उठायी लेकिन बदअकली के चलते नीच कही जाने वाली जातियों ने अपने लिए बराबरी नहीं बल्कि शिक्षा और प्रशासनिक नौकरियों में आरक्षण की माँग रखी . मूर्ख सरकार ने सत्ता लोलुपता के कारण नीच जाति के प्रतिनिधियों की इस माँग को बेहिचक स्वीकार कर लिया . अब शिक्षा और प्रशासन जैसे दोनों महत्वपूर्ण क्षेत्रों में लोगों का बुद्धि लब्धि से नहीं बल्कि जाति का नाम पूछ कर प्रवेश होने लगा . फलस्वरूप भारत देश में शिक्षा , ग्यान और विकास का स्तर गिरता गया . धोखेबाज नेता खरबपति होते गए पर देश गरीब होते होते दिवालिया हो गया .
नेताओं , अधिकारियों , ठेकेदारों और शिक्षकों की बेइमानियां दिनोंदिन बढ़ते जाने के कारण इस समृद्धशाली और विद्वानों की धरती से सबसे पहले विद्या समाप्त हो गयी .उसके बाद धीरे- धीरे इस देश में बेईमानी से बनायी गयी सारे इमारतें , पुल , आदि गिरते गए , सड़कें गड्ढों में बदलती गयीं जिसके चलते प्रकृतिक आपदा के समय अधिकांश लोग प्राण गंवा बैठे .
इस देश के लोगों ने बेवकूफी की हदें पार करते हुए अपनी धरती के सारे पेड़ काट डाले जिससे देश में ऑक्सीजन खत्म होता गया और विषैली गैसों ने लोगों की जान लेनी शुरू कर दी . कन्याओं को तो ये लोग भ्रूणावस्था में ही मार डालते थे. भूले भटके से कभी कोई कन्या पैदा हो भी जाये तो समाज में उसका कोई मान सम्मान न होता था . फलस्वरूप एक पीढ़ी खत्म हो जाने के बाद इन लोगों के पास अगली पीढ़ी को जन्म देने के लिए कोई माँ ही न बची और इस प्रकार धीरे धीरे शस्य श्यामला , रत्नगर्भा , वीरोत्पल , सोने की चिड़िया कहलाने वाला विद्वतजन्मा “भारत”नाम का देश संसार के नक्शे से विलुप्त हो गया . …”

ये होगा हमारा इतिहास …
पढ़ कर देखिये , शर्म से सर नहीं झुकता ??? क्या करें हम ?? सुधर जायें ??
या फिर रहने ही दें … कौन सा हम अपने वंशजों को अपना मुँह दिखाने आयेंगे …..

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Comments (2)

  1. बिल्कुल यही होगा हमारा इतिहास. हमारे इतिहास में कोई स्वर्ण गाथा नही होगी, कोई महान इंसान नही होगा, जिस पर फिल्म बन सकेगी, हाँ क्राइम, शैतान बहुत होंगें जिन पर फिल्म बन सकती है. खैर कोई जागेगा या नही लेकिन आपका ये लेख पढ़कर कुछ लोग तो जाग ही गये हैं 🙂 बधाई हो आपका प्रयास सफल हो रहा है … (y)

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