Sinserasays

कल्याणं अस्तु

ऊपर तो घमासान मचा हुआ है. सब के सब मिल कर श्री कृष्ण के पीछे पड़े हैं.

“आप ही ने कहा था कि जब जब धर्म की हानि होगी तब तब मैं पृथ्वी पर आऊंगा. अब क्यूँ नहीं जाते? धर्म तो सारा का सारा हानि में जा रहा है. आप किस बात का इंतजार कर रहे हैं?”

श्री कृष्ण तो झंडू बाम लगा कर कम्बल लपेटे सोये हुए थे. नाक कान सब जुकाम से बंद पड़ा था, सुनते कैसे. रामचन्द्र जी, हजरत मोहम्मद, ईसा मसीह, गुरु नानकदेव, गौतम, महावीर सब बेचैन हो कर वहीं टहल रहे हैं.

“अब ये कौनसा टाइम है जुकाम होने का. पानी तक तो बरस नहीं रहा कायदे से. ब्रज में थे तब तो रात दिन यमुना में विहार करते रहते थे. सावन भादो की पूरी भीषण बरसात गोपियों संग कदम्ब कुञ्ज में बीतती थी. और यहाँ अब चैन से मन्दिरों में सोने का सिंहासन मिल रहा है तो इन्हें जुकाम होने लग गया.”   रानी रुक्मिणी की व्यथा जाने धर्म की हानि पर थी या श्री कृष्ण के अतीत की, वो ही जानें. इतनी चकल्लस सुन कर कृष्णा ने हल्के से ऑंखें खोलीं और कम्बल से मुंह निकाल कर बोले-

“क्या यार !! हर पेपर में तो छपा है कि मैं बीमार हूँ, पुजारी जी बेचारे काढ़ा बना बना कर पिला रहे हैं और एक तुम हो जो पत्नी होकर भी चैन नहीं लेने दे रही.”

“अभी कुछ ही दिन पहले तो ठण्ड के दिनों में आप सर्दी से बेहाल थे. रेशमी गद्दे, तोशक और रजाई भी आपको गर्मी नहीं पहुंचा पा रहे थे तो कक्ष में हीटर तक लगाना पड़ा. तब तो ज़ुकाम नहीं हुआ आपको और अब इतनी सड़ी गर्मी में कैसे हो गया?  ये सब आरामतलबी छोडिये और बाहर जाकर देखिये आपसे मिलने के लिए सारे भगवान, पैगम्बर कितने बेचैन हैं.”

“मुझसे मिलने क्यूँ? ”

“बताया तो धर्म हानि में जा रहा है.”

“अरे!!” कृष्ण जी तो उछल पड़े. “हानि में कैसे जा रहा है भाई? भारत देश के औंधी खोपड़ी लोग अपने अंधेपन में धर्म के नाम पर मुफ्त में करोड़ों का माल चढ़ावे में चढ़ा देते हैं. ये मुफ्तखोरी का धंधा हानि में कैसे चला गया?”

“अरे वो धंधे वाला धर्म नहीं.” रुक्मिणी जी खिसिया गयी. “आप तो फूल मालाओं से इतना दबे हैं कि नीचे धरती पर क्या हो रहा है, झांक कर देख ही नहीं पाते. वहां बीते कई सालों से अनाचार, कदाचार, भ्रष्टाचार, स्वार्थीपन, लड़ाई-झगड़ा, मार-काट अपने चरम पर पहुँच चुका है. बलात्कार तो अब वहाँ ऐसे हो रहा है जैसे कोई चींटी पर नज़र पड़ते ही बिना सोचे समझे कुचल देता है. नवजात कन्या से लेकर 60 साल की वृद्धा, बहन, बेटी, शिष्या कोई भी सुरक्षित नहीं. आदमी भेड़िये की तरह दांत फाड़े लड़की जात को चीरने के लिए तैयार बैठा है. इस वाली धर्म-हानि की बात हो रही है.”

“ओह!!” श्री कृष्ण चिंता में पड़ गए. “पर मैं ही क्यूँ जाऊं? मोहम्मद साहब क्यूँ नहीं जाते? उनको तो युद्ध लड़ने का काफी अनुभव भी है. जंगल जंगल घूम कर इतना लड़े हैं. वो स्थिति सम्भाल लेंगे.”

तब तक बातचीत की आवाज़ सुनकर बाहर खड़े भगवान, पैगंबर सब अन्दर आ चुके थे. मुहम्मद साहब आखिरी बात सुन चुके थे. दुखी होकर कहने लगे. “मुझे कम हैरान किया है इन धरती वालों ने? मैं तो दुखी होकर इसीलिए कह आया था कि भैया, मैं ही आखिरी पैगम्बर था. अब अपना पचड़ा तुम खुद ही सम्भालना. अब तुम्हे बचाने कोई ऊपर से नहीं आयेगा.”

रामचन्द्र जी अब तक चुप होकर सुन रहे थे, बोले- “जब आपको फिर से नहीं जाना था तो अपनी पवित्र पुस्तक में सब कुछ ठीक से लिख ही देते. आपके लोगों को तो बस मदरसे वाले ‘जिहाद’ पढ़ा देते हैं. आगे वो खुद से जोड़ लेते हैं. लव-जिहाद, साइबर-जिहाद और पता नहीं क्या क्या. बस जो सामने मिल जाये उसे काफ़िर कह कर मार डालो. मन्दिर तोड़ कर मस्जिद बना दो. ये सब लिख कर आएंगे तो मेरे लोग आपके लोगों से युद्ध तो करेंगे ही.”

माहौल काफी गरम हो गया था. मोहम्मद साहब बोले- “आपने पढ़ी है मेरी किताब? मैंने कब लिखा कि बिना मतलब सबको मार डालो. हाँ “काफ़िर” यानि कि अधर्मी को मारने के लिए कहा है.”

“तो अधर्मी यानि काफ़िर की परिभाषा भी साफ साफ लिखते. आपके लोग तो हर गैर-मुस्लिम को काफ़िर कहते है. चाहे वो कितना भी धर्मशील क्यूँ न हो.”

“तो आपके लोग क्या करते हैं? गाय को माता कह कर पालते हैं और बूढी हो जाने पर कसाई को बेच देते है. आपभी जानते ही होंगे कि कसाई उसकी आरती तो उतारेगा नहीं. काट कर खाने के सिवा और क्या करेगा? फिर वही लोग उसे गोमांस खाने पर पीट-पीट कर मार डालते हैं. अरे तुमने अपनी माता को बेचा तभी तो हमने खाया. हम तो नहीं किसी को माता कह कर बेच आते.”

“अच्छा ठीक है, आप की तरह हम अपनी चचेरी ममेरी बहनों से शादी नहीं करते.”

“और हम आपकी तरह घर के अन्दर रिश्ते की भाभियों, चाचियों और बहुओं पर हाथ नहीं डालते.”

बात कहाँ से कहाँ पहुँच गयी थी. कृष्ण जी ने बीच बचाव किया.

“आप लोग शांत रहें. यहाँ और भी लोग हैं उन्हें भी बोलने का मौका दिया जाये.”

सबको साँप सूंघ गया था. ईसा मसीह बोले. “मुझे धरती पर जाने को न कहें. एक बार सूली पर चढ़ाया गया. अब कितनी बार चढ़ूँगा? ”

गुरु नानकदेव, गौतम और महावीर समवेत स्वर में बोले- “प्रभु! हमारे अनुभव भी कुछ अच्छे नहीं हैं लेकिन आप ने तो धरती वालों से वादा किया था कि जब जब धर्म की हानि होगी तब तब मैं आ कर तुम्हारा उद्धार करूँगा.  हमारे विचार से धरती पर इस समय जो अनाचार चल रहा है उसके हिसाब से आपका धरती पर जाने का सही समय आ गया है.”

कृष्ण जी अब तक पूरी तरह उठ कर बैठ चुके थे. मुस्कुरा कर बोले-

“देखिये, आप लोग ठीक से समझे नहीं. मैं ने कहा था ‘….जब धर्म की हानि होगी….’ . अब आप ही बताइए, धर्म कहीं था कभी? और जो था ही नहीं, है ही नहीं, उसकी हानि कैसे होगी? और जब हानि ही नहीं होगी तो मेरे धरती पर जाने का कोई मतलब ही नहीं है. मोहम्मद साहब की पालिसी ही ठीक है. वो धरती वाले अब अपने पचड़े खुद ही लड़-कट कर निपटा लेंगे. यहाँ से किसी को भेजने का रिस्क मैं नहीं ले सकता क्यूंकि उनके बीच ही अगर गलती से कोई शरीफ इन्सान पैदा हो जाता है तो ये उसे किसी न किसी तरह से मार ही डालते हैं. वैसे वहाँ जनसंख्या विस्फोट भी हो रहा है, अच्छा है,  धरती थोड़ी हलकी ही हो जाएगी.  मुझे तो जोर का जुकाम हुआ है. पुजारी जी काढ़ा लेकर आते ही होंगे. मुझे आराम करने दीजिये. आप लोग भी आराम करिए. और हाँ!! बस एक बात जान लीजिये. ये धरतीवासी बेहद स्वार्थी और अंदर से काइयां हैं. पैसा ही इनका सब कुछ है, इसके आगे इनके लिए माँ, बाप, भाई, बहन किसी रिश्ते का कोई मोल नहीं है. हमको आपको भी इसने अपनी मक्कारी की आड़ लेने के लिए ही रचा है. इसलिए जैसे ये हमें बना कर भूल गया है वैसे ही आप भी इसे भूल जाइये. आने वाले सौ पचास सालों में धरती ऐसे भी इनके कुकर्मों के कारण ख़ाली ही होने वाली है. तब हम सब मिल कर अपने आदर्शों, उसूलों और सद्विचारों वाले सच्चे इन्सान का निर्माण करेंगे. वर्तमान वाले इन्सान का कुछ उद्धार होगा , ये बात अब भूल जाइये. जाइये मुंह ढक  कर चैन से सोइये.”

“कल्याणंअस्तु “

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Comments (2)

  1. आदरणीय सरिता दीदी जी, लिखा तो आपने फुर्सत निकलकर… सबको लपेटा है. अब इन्तजार करिये की कौन पूरा पढ़कर प्रतिक्रिया क्या देता है ?…रोचकता भी खूब है ! एक सांस में पूरा पढ़ गया… बस लिखिए जरूर। .कटाक्ष भरपूर … जय हो !

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  2. पूरे पांच तारे आप की झोली में

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