वंदना

या कुन्देंदु तुषारहार धवला यह कैसा समय है आया , हंसा नाम धरा कर कव्वा कैसा स्वांग बना कर आया , नभ जल थल अवनि अम्बर तल विकल सकल संसार हुआ है , तेरे कर की पुस्तक का अब कोई न गुणग्राह बचा है , स्वार्थ

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सब अपनी-अपनी जीते हैं..

उम्मीदों की ज्वाला में जलती है जिन्दगी रोज यहां तुम कहते हो तो मान लिया जो हुआ है वो कुछ भी ना हुआ .... बड़ी मुश्किल से हम अपने घर में कुछ दीये जला कर बैठे थे तुमने एक पल में आकर सारे ख्वाब बुझा

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तुम्हारी हर बात पर हमसे अब ‘हा हा हा’ नही होता…

तुम्हारी हर बात पर हमसे अब 'हा हा हा' नही होता तुम्हारी हर पोस्ट पर हमसे अब 'वाह वाह' नही होता... न जाने क्यों लगती है हर बात बनावट अब तुम्हारी हर बात पर हमसे अब 'क्या बात है' नही होता ... जब सादगी

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:- आह्वान गीत :-

  :- आह्वान गीत :- तुम जो कहते थे ये भी वही कहते है , शासक बदलते रहे दर्द एक से रहते है l जुबा से सब पौरुष का बखान करते है , पर सीमा पर हर दिन जवान मरते है ll आओ सीमा से सियासत अलग करते है , मिलकर एक बार

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:- मेरी भावनायें :-

  लिखने से पहले जंग की तैयारी कर ली है, अपने हर लफ्ज में बारूद भर ली है l मेरे जख्मो दर्द का इल्म नहीं है मुझको , अपनी पीर तो रब के हवाले कर दी है ll मेरे रास्ते बहुत कठिन है , पर मुझे खुद पर यकीन है

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